रसोई घर: सामुदायिक रसोई

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साँझा चुल्ला

हम हाल ही में बीते क्षण में आपको वापस ले जाना चाहेंगे। सूर्यास्त के बाद अपना खाना पकाने के लिए ग्रामीण महिलाएं एक आम जगह पर इकट्ठा होती थीं। वे एक साथ अपने घरों से बर्तन,अनाज,मसाला लेकर एक आंगन के बीच में या आम जगह जैसे की चौपाल पर एक विशालकाय तंदूर में अपना खाना पकाती थी और अपने-अपने घरों में ले जाती थीं। इस सामाजिक मिलन परिचालन को सांझा चूल्हा कहते है। जैसे पुराने दिनों में हमारे दादा वगैरह सामुदायिक रुप में ज्यादा समझदारी से रहते थे। इस सामजिक ताने-बाने को मजबूत ताकत दरअसल तारीख दरअसल सांझ चूल्हा मजबूत बनाता है। अलग –अलग धर्मों के बावजूद महिलाए साथ में आती हैं तथा साथ में खाना पकाते गप मारती हैं तथा अपने पारिवारिक बातों की चर्चा करती हैं।

रसोई घर ®

‘रसोई घर’ जिसका शब्दश: अनुवाद हम ‘कुकिंग रुम’ कर सकते हैं, वह एक सामुदायिक रसोई है जो गांव के कई घरों द्वारा सम्मिलित रुप से की जाती है जोकि परम्परागत सांझा चूल्हा का आधुनिक स्वरुप है ।गांव के केन्द्र में पक्के घर में स्थित ‘रसोईघर’में गांव के घर के लोग अपना दैनिक खाना सुरक्षित तथा आरामदायक ढंग से बनाते है। प्रत्येक रसोईघर प्रर्याप्त पानी: कुकिंग स्टोव, खाना बनाने के लिए बर्तन और स्थानांतरित किए जा सकने वाले एलपीजी सिलिंडरों से जुड़े कम से कम स्टोव से सजा रहता था।

इस रसोई घर की अवधारणा आज के ग्रामीण घरों में एलपीजी के प्रयोग को बढ़ाने के एचपीसीएल के प्रयासों का रणनीतिक घटक था। प्रत्येक रसोई घर स्थापित करने की लागत एचपीसीएल द्वारा कवर की जाती है जिसके प्रयोगकर्ता से सिलिण्डर रिफिल की लागत वसूलने हेतु औसत रु 4 प्रति घंटे का प्रभार लिया जाता है जोकि एक घर में एक एलपीजी कनेक्शन स्थापित करने से सस्ता दैनिक विकल्प है।

आधुनिक रसोई गैस का ईंधन अभी भी ग्रामीण भारतीय परिवारों के अधिकसंख्यक द्वारा प्रयुक्त पारंपारिक ईंधन का एक स्वागत योग्य विकल्प है। इन पारंपारिक ईंधनों के कई नुकसान हैं, जैसे जलने की अक्षमता और वह इस प्रकार कि नियंत्रण में कठिनाई हो। पारंपारिक ईंधन का संग्रह भी कठिन और समय लेनेवाला है जिस पर औसत ग्रामीण काफी समय और दैनिक उर्जा आवश्यक्ताओं पर आय का महत्वपूर्ण हिस्सा खर्च कर देता है जिसका 90 % खाना बनाने पर खर्च हो जाता है। जैसे कि पता है कि 80% ग्रामीण भारत कथित पर्याप्त रसोई गैस प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करता है।

वर्तमान में, ईंधन की लकड़ी भारत की आधे से अधिक घरेलू उर्जा प्राप्त करता है जिससे वनों की कटाई की समस्या और भी विकराल हो जाती है। भारतीय वन सर्वेक्षण की नागपूर की “लकड़ी खपत अध्ययन” के आधार पर, 4 सदस्यों के एक परिवार की औसत लकड़ी ईंधन की खपत 4 किग्रा यानी लगभग 10 छोटे वृक्ष हैं। इसका एक माह का प्रति परिवार औसत प्रति माह 300 वृक्ष या 3600 वृक्ष प्रति वर्ष है। यदि सिर्फ 10 महिलाएं एक रसोई घर में खाना बनाती हैं तो प्रति वर्ष लगभग 36000 वन की कटाई नही होती है। एचपीसीएल तथा महाराष्ट्र राज्य वन विभाग के संयुक्त सहयोग से निर्वनीकरण की समस्या से निपटने हेतु यवतमाल जिले में तेजी से रसोई घर बनाए गए जिसमें 800-900 घर तथा 900 वर्ग कि.मी. लंबा पंढारकावड जंगल है। पंढारकावड जंगल विभाग में 100 रसोई घरों शुरु होने से प्रति वर्ष 36 लाख पेड़ नष्ट होने से बच जाएंगे और इस बचत से वन कवर विभाग के प्रयासों से पर्याप्त सुधार होगा।

पारम्पारिक ईंधन जैसे लकड़ी और गोबर लीद से खतरनाक रसायन जैसे हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोक्साइड ओर सल्फर ऑक्साइड निकलते है। खाना बनाने की जगह कम हवादार होने से, इस धुएं से श्वसन बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। जलती घातक लकड़ी का सहउत्पाद कैर्सिनोजेन बेन्जोप्र्येने,एक कैंसरकारक तत्व है ।विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा प्रायोजित अध्ययन के अनुसार,भारतीय महिलाएं जो नियमित रुप से खाना बनाने हेतु लकड़ी की आग प्रयोग में लाती है जितनी एक दिनों मे 20 पैकेट सिगरेट के धुंए में होती है। इसके विपरीत गैस ईंधन जैसे एलपीजी. ठोस ईंधन से ज्यादा प्रभावकारी रुप से जलता है और बहुत कम हानिकारक होता है।

प्रक्रिया

ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वेक्षण के आधार पर, 400 परिवारों के गंवो को लक्षित किया गया है जिनमें से कम से कम 10-12 परिवार आर 3/आर 4 सेक्टर मे हैं। सामान्यत: ग्रामीण एक साथ (झुंड मे) रहना चाहते हैं अत: ग्राम पंचायत या समुदाय को समुचित जगह उपलब्ध कराने की आवश्यक्ता होती है जो लक्षित झुंड के मध्य में हो। गांव मे रसोई घर सफलतापूर्वक स्थापित करने के लिए वहां का 5-6 बार गहन दौरे किए जाने चाहिए । ग्रामपंचायत पहुंचने पर विशेष तौर समुदाय से मेल जोल बढ़ानी पड़ती है। एक बार समुदाय द्वारा रुचि,रसोई घर स्थापित करने में दिखाई जाने पर,समुदाय के एक व्यक्ति उसके परिचालन हेतु प्रबंधन तथा रखरखाव की व्यवस्था हेतु नियुक्त किया जाता है। यह सामान्यत: पहले से ही विद्यमान स्वयं सहायता समूह या व्यकित गांववासियों से चयनित होता है।

रसोई घर ………….. व्यवहार में बदलाव हेतु एक उपकरण

निश्चित रुप से, एक औसत ग्रामीण महिला के लिए रसोई घर परंपरागत महत्वपूर्ण रुप से परिप्रेक्ष्य बदलने के समान है। जमीन पर परंपरागत चूल्हे से लेकर उंचे प्लेटफॉर्म पर गैस स्टोव का उपयोग करते हुए प्रभावी रुप से, रसोई घर की अवधारणा ग्रामीण की मुख्य आवश्यक्ता और उसके व्यवहारगत मानकों के बीच विसंगति सृजित करती है। उसी रुप मे कुछ पहल समुचित व्यवहारगत परिवर्तन लाने के लिए की जाती है। उदाहरण के लिए,महिलाओं को सुरक्षा मामलों में सलाह दी जाती है और कुछ सुरक्षा वाक्य रसोईघर की दीवारों पर ही प्रदर्शित होते हैं। स्वाभाविक रुप से, कई अपरिचित से संदिग्ध चित्त रहते हैं।

एचपीसीएल - एक जिम्मेदार निगमित नागरिक (सीएसआर)

एचपीसीएल ने अनेक ग्रामीण भारतीय परिवारों के लिए, सुरक्षित, स्वच्छ और कुशल ईंधन उपलब्ध कराने के अपने लक्ष्य को हासिल किया है. इस अवधारणा को अस्पतालों, मंदिरों, चुंगी नाकास और ट्रक पार्किंग क्षेत्रों के लिए भी लागू कर दिया गया है। महाराष्ट्र वन विभाग के साथ अपने सहयोगात्मक प्रयासों के साथ ही एचपीसीएल ने कई अन्य सरकारी विभागों के साथ अपनी मौजूदा परियोजनाओं के समर्थन करने के लिए साझेदारी की है. उदाहरण के लिए सरकार चालित ‘मिड डे स्कीम’ जो देशभर में स्कूली बच्चों को ताजा खाना उपलब्ध कराती है, के लिए रसोई घर का इस स्कीम में एकीकरण करना। रसोई घर पायलट के सकारात्मक अनुभव ने इस परिचालन को इतना बढ़ाया है कि एचपीसीएल रसोईघर अब 850 गांवो में कार्यरत है एवं 13,000 परिवार इसके लाभार्थी हैं। रसोई घर उपयोगकर्ताओं को अपने एलपीजी कनेक्शनों से व्यक्तिगत ग्राहक में परिवर्तित करने की सफलता के कारण, विद्यमान रसोईघर खत्म हो सकते हैं और इसका आधारभूत ढांचा एक और गांव में परियोजना शुरु करने हेतु शिफ्ट हो सकता है। वर्तमान योजना देशभर में रसोईघर की स्थापना कर करीब 80,000 गांवों तक पहुंचना है और प्रभावी ढंग से एचपीसीएल एलपीजी को ग्रामीण भारत नेटवर्क में विस्तृत करना है तथा ग्रामीण उपभोक्ताओं के व्यवहारगत पैटर्न में बदलाव लाना है।

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